दशहरा 2026: 20 अक्टूबर, विजय मुहूर्त और उच्च गुरु का संयोग, इस वर्ष विजयादशमी क्यों असाधारण है

वर्ष में एक बार एक ऐसी तिथि आती है जब समय स्वयं विजय का आशीर्वाद लेकर उतरता है।
वह तिथि है अश्विन शुक्ल दशमी। विजयादशमी।
2026 में यह तिथि मंगलवार, 20 अक्टूबर को है। और इस वर्ष इसमें एक विशेषता और जुड़ रही है। गुरु अभी भी कर्क राशि में उच्च के हैं। 31 अक्टूबर को ही वे सिंह में जाएंगे। अर्थात विजयादशमी 2026 के दिन उच्च बृहस्पति आकाश में विराजमान होंगे।
मंगलवार का दिन। उच्च गुरु। श्रवण नक्षत्र। विजय मुहूर्त।
यह संयोग साधारण नहीं है।
अपनी कुंडली में इस दिन के ग्रह-योग देखें: विजयादशमी 2026 के दिन आपकी कुंडली में विजय-योग है या नहीं, यह जानें।
दशहरा 2026: तिथि, मुहूर्त और पंचांग विवरण
• तिथि: मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
• दशमी तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर, दोपहर 12:50 बजे
• दशमी तिथि समाप्ति: 21 अक्टूबर, दोपहर 2:11 बजे
• नक्षत्र: श्रवण (सायं 6:02 बजे तक)
• विजय मुहूर्त: दोपहर 2:19 बजे से 3:06 बजे तक (47 मिनट)
• अपराह्न काल: दोपहर 1:14 बजे से 3:30 बजे तक
एक महत्वपूर्ण बात: 20 अक्टूबर की सुबह अभी भी नवमी तिथि है। दशमी तिथि 12:50 बजे से प्रारंभ होती है। इसलिए विजयादशमी की सभी पूजाएं दोपहर के बाद ही करनी चाहिए। जो लोग सुबह जल्दी पूजा करके निवृत्त हो जाते हैं, वे वास्तव में नवमी में पूजा कर रहे होते हैं, दशमी में नहीं।
विजय मुहूर्त क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है
वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक दिन के 30 मुहूर्तों में से एक होता है विजय मुहूर्त। यह प्रतिदिन अपराह्न में आता है। किंतु अश्विन शुक्ल दशमी को यही मुहूर्त वर्ष का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त बन जाता है।
क्यों?
क्योंकि दशमी तिथि स्वयं धर्म की तिथि है। शुक्ल पक्ष की दशमी में सूर्य का बल, चंद्रमा की वृद्धि और दिन का अपराह्न काल, तीनों मिलकर एक ऐसी ऊर्जा बनाते हैं जो किसी भी कार्य के आरंभ के लिए शुभ होती है। इसीलिए इसे अबूझ मुहूर्त भी कहते हैं।
अबूझ मुहूर्त का अर्थ है वह मुहूर्त जिसे किसी और गणना की आवश्यकता नहीं। किसी पंचांग शोधन, लग्न विचार या होरा देखने की जरूरत नहीं। विजय मुहूर्त में किया गया कार्य स्वतः शुभ माना जाता है।
मुहूर्त चिंतामणि में कहा गया है:
"विजया नाम दशम्यां तु प्रतिपत्तिः शुभा मता। सर्वकार्येषु सिद्धिः स्यात् तस्यां कर्तव्यमेव हि।।"
अर्थात: विजय नाम की दशमी तिथि सभी कार्यों में सिद्धि देती है। इस तिथि में हर कार्य करने योग्य है।
2026 में विजय मुहूर्त 2:19 PM से 3:06 PM तक रहेगा। यह केवल 46 मिनट का समय है। इस अवधि में जो भी शुभ कार्य आरंभ किया जाए, व्यापार, यात्रा, शिक्षा, गृह प्रवेश, नया निवेश, नई नौकरी का पहला दिन, वह सफल होता है।
2026 में विजयादशमी की तीन विशेषताएं
• पहली विशेषता: मंगलवार
मंगलवार मंगल का दिन है। मंगल पराक्रम, साहस, शत्रु-विजय और संकल्प-शक्ति का ग्रह है। जब विजयादशमी मंगलवार को पड़ती है, तब बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ भीतरी शत्रुओं पर भी विजय पाने की ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
रावण के दस सिर केवल बाहरी दुर्गुण नहीं थे। वे हमारे भीतर के दस विकार हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, स्वार्थ, अन्याय, अमानवता और अहंकार। मंगलवार की शक्ति इन्हीं भीतरी रावणों को जलाने की है।
• दूसरी विशेषता: उच्च गुरु
विजयादशमी 2026 के दिन गुरु कर्क राशि में उच्च के हैं। 31 अक्टूबर को ही वे सिंह में प्रवेश करेंगे। उच्च गुरु ज्ञान, सत्य, न्याय और धर्म का सर्वोच्च प्रतिनिधित्व करते हैं। जब रावण-दहन उच्च गुरु की उपस्थिति में हो, तो वह केवल एक पुतला जलाना नहीं है, वह एक ज्योतिषीय संकल्प का क्षण है।
• तीसरी विशेषता: श्रवण नक्षत्र
20 अक्टूबर को संध्या 6:02 बजे तक श्रवण नक्षत्र रहेगा। श्रवण का अर्थ है "सुनना"। इसके देवता विष्णु हैं। यह नक्षत्र सीखने, ज्ञान ग्रहण करने और दिव्य वाणी को सुनने का नक्षत्र है। विजय मुहूर्त (2:19-3:06) श्रवण नक्षत्र के भीतर ही है। इसलिए इस मुहूर्त में नई विद्या का आरंभ, गुरु से दीक्षा, शास्त्र-पाठ या किसी बड़े संकल्प का उच्चारण विशेष फलदायी होगा।
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अपराजिता पूजा: विजयादशमी का केंद्रीय अनुष्ठान
अपराजिता का अर्थ है "जिसे कभी पराजित न किया जा सके।" यह देवी दुर्गा का ही एक रूप है। विजयादशमी पर अपराजिता पूजन का विधान शास्त्रों में विशेष रूप से वर्णित है।
• पूजा का समय: अपराह्न काल, अर्थात 1:14 PM से 3:30 PM के बीच। विजय मुहूर्त (2:19-3:06) में करना सर्वोत्तम।
• पूजा स्थान: घर के उत्तर-पूर्व कोने में (ईशान कोण) या किसी स्वच्छ स्थान पर।
• पूजा सामग्री: अपराजिता के नीले फूल (विजयापुष्प), अक्षत, कुमकुम, धूप, दीप, नैवेद्य।
• मंत्र:
"हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।" (श्री सूक्त, ऋग्वेद)
अपराजिता पूजन के बाद शमी वृक्ष की परिक्रमा करना और उसकी पूजा करना परंपरागत है।
शमी पूजा: क्षत्रिय धर्म और ज्योतिष का संगम
शमी वृक्ष और विजयादशमी का संबंध महाभारत से है।
पाण्डवों ने अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में अपने शस्त्र एक शमी वृक्ष में छिपाए थे। जब एक वर्ष पूरा हुआ, तब ठीक विजयादशमी के दिन उन्होंने वे शस्त्र निकाले और युद्ध के लिए प्रस्थान किया। तभी से शमी पूजा का यह पर्व मनाया जाता है।
ज्योतिष में शमी वृक्ष शनि से संबंधित है। शनि कर्म, न्याय और दायित्व के देवता हैं। जब विजयादशमी पर शमी की पूजा होती है, तो वास्तव में यह संदेश है: "अपने दायित्व को समझो, अपने कर्म को पूरा करो। शनि के न्याय पर भरोसा रखो।"
शमी पूजा का मंत्र:
"शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।। करिष्यमाणयात्रायां यथाकालं सुखं मया। तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते।।"
अर्थात: शमी पाप को शांत करने वाली है, शत्रुओं का नाश करने वाली है। अर्जुन के धनुष की धारिणी और राम की प्रियदर्शिनी है। हे शमी, मेरी यात्रा में विघ्नरहित सुख की दात्री बनो।
शस्त्र पूजा और आयुध पूजा: अपने कार्यों का सम्मान
विजयादशमी पर केवल तलवार या बंदूक की पूजा नहीं होती। यह उन सभी साधनों की पूजा का दिन है जिनसे आप अपना कार्य करते हैं।
किसान अपने हल और कृषि यंत्र की पूजा करता है। कारीगर अपने औजारों की। विद्यार्थी अपनी पुस्तकों और लेखनी की। व्यापारी अपनी बहीखाते और गल्ले की। संगीतकार अपने वाद्ययंत्रों की।
इसे आयुध पूजा कहते हैं। दक्षिण भारत में यह परंपरा विशेष रूप से जीवित है जहाँ वाहन, मशीनें और उपकरण सभी धोए जाकर तिलक लगाया जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से यह पूजा दशम भाव (कर्म भाव) की पूजा है। जो उपकरण आपके जीवन-यापन का आधार हैं, उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करना, यही आयुध पूजा का सार है।
रावण के दस सिर: दस ग्रह और दस विकार
एक ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखें तो रावण के दस सिर नवग्रहों और लग्न के प्रतीक भी माने जाते हैं। हर ग्रह अपनी अशुभ अवस्था में एक विशेष विकार देता है।
• सूर्य की अशुभता: अहंकार और दंभ।
• चंद्रमा की अशुभता: मन की अस्थिरता और मोह।
• मंगल की अशुभता: क्रोध और हिंसा।
• बुध की अशुभता: छल और वाक्-विकृति।
• गुरु की अशुभता: धर्म का पाखंड।
• शुक्र की अशुभता: काम और विलास।
• शनि की अशुभता: निराशा और आलस्य।
• राहु की अशुभता: लालच और भ्रम।
• केतु की अशुभता: वैराग्य का दुरुपयोग या अंधविश्वास।
• और दशवाँ, स्वयं लग्न की विकृति: स्वार्थ।
विजयादशमी पर रावण-दहन का संकल्प यह है: अपनी कुंडली में जो ग्रह पीड़ित हैं या जो विकार प्रबल हैं, उन्हें जलाने का संकल्प। यह कोरा प्रतीक नहीं है। यह एक जागरूक आत्म-शोधन है।
विजयादशमी 2026 पर क्या करें, क्या न करें
करें:
• सुबह नवरात्रि की नवमी पूजा पूरी करें।
• दोपहर 12:50 के बाद दशमी का आरंभ मानें।
• 1:14 से 3:30 के बीच अपराजिता पूजा करें।
• विजय मुहूर्त (2:19-3:06) में कोई नया कार्य, यात्रा, या संकल्प लें।
• शमी वृक्ष का पूजन करें।
• अपने कार्य-साधनों की पूजा करें।
• संध्या समय रावण-दहन देखें और भीतरी विकारों को त्यागने का संकल्प लें।
न करें:
• सुबह जल्दी में अपराजिता पूजा न करें, दशमी तिथि नहीं है।
• पूजा के बाद तुरंत भोजन न करें, विजय मुहूर्त में पूजा और संकल्प पहले, फिर अन्य कार्य।
• इस दिन नया ऋण न लें।
• झगड़ा या विवाद न करें।
विजयादशमी पर 12 राशियों के लिए संकल्प
• मेष: शत्रुओं पर विजय और साहसिक निर्णय के लिए विजय मुहूर्त में संकल्प लें।
• वृषभ: पारिवारिक कलह और संपत्ति विवाद के समाधान के लिए इस दिन शमी पूजा अवश्य करें।
• मिथुन: व्यापार के नए द्वार खोलने के लिए आयुध पूजा में अपने व्यापारिक उपकरणों को शामिल करें।
• कर्क: उच्च गुरु आपके द्वितीय भाव में हैं। इस दिन वाणी और ज्ञान के क्षेत्र में नया संकल्प लें।
• सिंह: जन्म-राशि पर केतु के होने के कारण इस दिन विशेष रूप से अपराजिता पूजन और पितृ-स्मरण करें।
• कन्या: द्वादश भाव में गुरु हैं। इस दिन किसी आध्यात्मिक यात्रा का संकल्प लें या ध्यान-साधना आरंभ करें।
• तुला: सूर्य आपकी राशि में हैं (विजयादशमी के दिन)। यह आपका विशेष समय है। नई पहचान, नया उद्यम और आत्मप्रकाश का संकल्प लें।
• वृश्चिक: दशम भाव में गुरु हैं। करियर में कोई महत्वपूर्ण निर्णय इस विजय मुहूर्त में लेना अत्यंत शुभ होगा।
• धनु: नवम भाव में गुरु हैं। तीर्थयात्रा, उच्च शिक्षा या किसी गुरु से दीक्षा का आरंभ इस दिन करें।
• मकर: इस दिन पितृ-पूजन और अपने पूर्वजों के स्मरण पर विशेष ध्यान दें।
• कुंभ: राहु आपकी राशि में अभी हैं (दिसंबर तक)। इस दिन राहु शांति के उपाय करना लाभदायक होगा।
• मीन: शनि आपकी राशि में हैं। शमी पूजा आपके लिए विशेष रूप से शुभ है इस वर्ष।
अष्टकवर्ग और विजयादशमी: कब मिलेगी विजय
विजयादशमी पर मुहूर्त का लाभ सबको समान नहीं मिलता। आपकी कुंडली के दशम भाव में और वर्तमान गोचर-ग्रह की राशि में अष्टकवर्ग के कितने बिंदु हैं, यह महत्वपूर्ण है।
दशम भाव में 28 से अधिक बिंदु हों तो यह वर्ष कार्यक्षेत्र में विशेष सफलता का है। गुरु (कर्क) के अष्टकवर्ग में भी यदि बिंदु अनुकूल हों तो विजयादशमी का संकल्प शीघ्र फल देता है।
अपनी कुंडली का विश्लेषण करें: इस विजयादशमी आपकी कुंडली में विजय के योग हैं या नहीं, जानें।
विजयादशमी के उपाय
• गुरु के लिए (उच्च गुरु का लाभ): इस दिन पीले वस्त्र धारण करें। किसी विद्वान या गुरु को भोजन कराएं अथवा पीले मीठे चावल (केसरिया खीर) का दान करें।
• मंगल के लिए (मंगलवार का शुभ उपयोग): लाल फूल शिव को अर्पित करें। हनुमान जी की पूजा करें। मंगल के बीज मंत्र "ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः" का 108 बार जाप करें।
• केतु शांति के लिए (सिंह जातकों हेतु): गणेश पूजन करें। तिल दान करें। पितृ-तर्पण करें।
• सामान्य उपाय: सूर्योदय से पहले स्नान करें। नीले अपराजिता फूल तोड़कर देवी को अर्पित करें। सायंकाल दीपदान करें।
दशहरा 2026 का अंतिम संदेश
विजयादशमी केवल पुराणकथा का उत्सव नहीं है।
यह उस ज्योतिषीय क्षण का उत्सव है जब दशमी तिथि, अपराह्न काल और विजय मुहूर्त एक साथ आते हैं। यह वह क्षण है जब आकाश और पंचांग दोनों एक साथ कहते हैं: अभी संकल्प लो, अभी आरंभ करो।
2026 में मंगलवार और उच्च गुरु ने इस क्षण को और शक्तिशाली बना दिया है।
20 अक्टूबर, दोपहर 1:59 से 2:45 बजे, यह 46 मिनट आपके जीवन के किसी महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत के लिए हैं।
गोचर फल जानें: इस विजयादशमी कौन से ग्रह आपकी राशि पर अनुकूल हैं और किन क्षेत्रों में विजय मिलेगी।
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